Tuesday, June 03, 2008

मेरी कवीतायें - जाने क्यों ?

जाने क्यों फ़िर कीसी से मैंने प्यार किया ,
जाने क्यों फ़िर कीसी पे मैंने ऐतबार किया ,
सोचा था मिलेगी खुशी ज़िंदगी भर के लीये ,
बस इस चाह के लीये ख़ुद को बेकरार किया !


बह रहे थे आँसूं मेरी आंखों से ,
देख के फ़िर भी उसने मुझपे ये वार किया ,
प्यार करने की सजा ऐसी देगा मेरा साया ,
बस इसी सोच ने मेरा जीना दुश्वार किया !

क्यों मेरे प्यार को खुश नहीं रख पाया मैं ?
उसके काजल के लीये ख़ुद को नहीं जला पाया मैं,
उसके होठों की वो हँसी नहीं बन पाया मैं ,
उसकी बिंदिया की वो चमक नहीं बन पाया मैं १

उसके माथे का वो टीका नहीं बन पाया मैं,
उसकी पायल के वो घुंघरू नहीं बन पाया मैं,
उसकी आंखों की शरारत नहीं बन पाया मैं,
उसकी साँसों की वो महक नहीं बन पाया मैं!

दील ही नही रहा फ़िर ये जीना कैसा ?
साँसों के यूं चलने का मतलब कैसा ?
इस तड़प मैं यूं जलने का मतलब कैसा ?
इस ज़हर को यूं पीने का मतलब कैसा ?

पर ये उम्मीद है के यूं मरती भी नहीं ,
उसकी यादों ने हर वक्त दील को पार किया,
पता नहीं कब आ जाए कब्र पे मिलने ,
आँखे खोल के हर पल बस उसका इंतज़ार किया !!

"भूमी - पुत्र "

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