असमंजस के भंवर जाल से,
पीड़ा हर पल उठती है।
विश्वासों के बांधों को,
तोड़ तोड़ कर बहती है।
उद्वेलित और व्याकुल मन बस,
व्यथा कथा ही कहता है,
प्यासे अन्तर को पुरा भर दे,
उस लहर को तरसता है।
कोई शब्द नहीं मिलते हैं,
इस पीडा को समझाने को।
कोई हल नहीं मिलते हैं,
इस गुत्थी को सुलझाने को।
जीवन ऐसा कैसा है जो,
तृप्त नहीं कर पाता है।
हर परत हटती रहती है ,
घाव गहराता जाता है ।
कोई, कहीं तो, कुछ तो होगा,
इसी आस पे जीवन चलता है।
हर प्रभात नई शुरुआत समझ के,
आगे बढ़ता रहता है।
कोई रहस्य नहीं जीवन मे,
सब इश्वर की माया है।
जो यह गुत्थी समझ गया है,
मोक्ष वही ले पाया है।
होगा एक दिन ये भी होगा ,
मुझे मुक्ति का मार्ग मिलेगा ।
सुख दुःख का अन्तर नहीं होगा तब,
उस स्वर्ग का द्वार मिलेगा ।
तब तक जीता हूँ इस जीवन को,
जो होगा देखा जाएगा।
अंधकार इतना बड़ा नहीं है,
सूर्य फ़िर से आएगा ॥
भुमिपुत्र
Sunday, February 24, 2008
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